कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ७६ / २०४ № 76 of 204 रचना ७६ / २०४
१३ मार्च २०१५ 13 March 2015 १३ मार्च २०१५

जब जब नींद बुलाऊँ, चलकर आतीं यादें jab jab neend bulaaoon, chalakar aateen yaaden जब जब नींद बुलाऊँ, चलकर आतीं यादें

जब-जब

नींद बुलाऊँ, चलकर आतीं यादें

करवट-करवट

बिस्तर पर बिछ जातीं यादें

करूँ

बंद यदि दिल-दिमाग के, द्वार खिड़कियाँ

खोल

झरोखा मंद-मंद मूस्कातीं यादें

बन

पाखी पंखों पर अपने बिठा प्यार से

उड़

अनंत में, पुर-युग याद दिलातीं यादें

चल-चल

कर इनके पग शायद कभी न थकते

पर

मथ-मथ मेरा मन खूब थकातीं यादें

कभी

चुभातीं शूल, कभी फूलों की तरह से

रस-सुगंध

भर हृदय-चमन महकातीं यादें

अगर

रुलाई आ, कस ले अपने घेरे में

छेड़

गुदगुदी, खिल-खिल खूब हँसातीं यादें

उलझाकर

उर, भूतकाल में जगा रात भर

भोर

“कल्पना” नींद साथ ले जातीं यादें

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

jab-jab

neend bulaaoon, chalakar aateen yaaden

·

karawat-karawat

bistar par bich jaateen yaaden

·

karoon

band yadi dil-dimaag ke, dvaar khidakiyaan

·

khol

jharokhaa mand-mand mooskaateen yaaden

·

ban

paakhee pankhon par apane bithaa pyaar se

·

ud

anant men, pur-yug yaad dilaateen yaaden

·

chal-chal

kar inake pag shaayad kabhee n thakate

·

par

math-math meraa man khoob thakaateen yaaden

·

kabhee

chubhaateen shool, kabhee phoolon kee tarah se

·

ras-sugandh

bhar hriiday-chaman mahakaateen yaaden

·

agar

rulaaee aa, kas le apane ghere men

·

ched

gudagudee, khil-khil khoob hansaateen yaaden

·

ulajhaakar

ur, bhootakaal men jagaa raat bhar

·

bhor

“kalpanaa” neend saath le jaateen yaaden

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

जब-जब

नींद बुलाऊँ, चलकर आतीं यादें

करवट-करवट

बिस्तर पर बिछ जातीं यादें

करूँ

बंद यदि दिल-दिमाग के, द्वार खिड़कियाँ

खोल

झरोखा मंद-मंद मूस्कातीं यादें

बन

पाखी पंखों पर अपने बिठा प्यार से

उड़

अनंत में, पुर-युग याद दिलातीं यादें

चल-चल

कर इनके पग शायद कभी न थकते

पर

मथ-मथ मेरा मन खूब थकातीं यादें

कभी

चुभातीं शूल, कभी फूलों की तरह से

रस-सुगंध

भर हृदय-चमन महकातीं यादें

अगर

रुलाई आ, कस ले अपने घेरे में

छेड़

गुदगुदी, खिल-खिल खूब हँसातीं यादें

उलझाकर

उर, भूतकाल में जगा रात भर

भोर

“कल्पना” नींद साथ ले जातीं यादें

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗