कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १३९ / २०४ № 139 of 204 रचना १३९ / २०४
७ अक्तूबर २०१६ 7 October 2016 ७ अक्तूबर २०१६

मातृ-शक्ति की छाँव maatrii-shakti kee chaanv मातृ-शक्ति की छाँव

सकल

विश्व में फैली चारों ओर जीव हित।

मंगलकारी

मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित।

जब-जब

आती पाप-लोभ की बाढ़ जगत में

नव-दुर्गा

तब प्राण हमारे करती रक्षित।

मनता

जब नवरात्रि-पर्व हर साल देश में

दिव्य

प्रभा से मिट जाता सारा तम दूषित।

घटस्थापना, जगराते, माहौल बनाते

जिसमें

होते सकल दुष्टतम भाव विसर्जित।

चलता

दौर उपवास भजन का जब तक घर-घर

माँ

देवी से माँगे जाते, वर मनवांछित।

देशबंधुओं, नाम देश का पर्वों

से ही

विश्व-फ़लक

पर स्वर्ण अक्षरों में है अंकित।

अमर

रहें ये परम्पराएँ, युगों “कल्पना”

अजर

रहे यह संस्कारों की ज्योत-अखंडित।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

sakal

wishv men phailee chaaron or jeew hit

·

mangalakaaree

maatrii-shakti kee chaanv aparimit

·

jab-jab

aatee paap-lobh kee baaढ़ jagat men

·

naw-durgaa

tab praan hamaare karatee rakshit

·

manataa

jab nawaraatri-parv har saal desh men

·

divy

prabhaa se mit jaataa saaraa tam dooshit

·

ghatasthaapanaa, jagaraate, maahaul banaate

·

jisamen

hote sakal dushtatam bhaaw wisarjit

·

chalataa

daur upawaas bhajan kaa jab tak ghar-ghar

·

maan

dewee se maange jaate, war manawaanchit

·

deshabandhuon, naam desh kaa parvon

se hee

·

wishv-falak

par svarn aksharon men hai ankit

·

amar

rahen ye paramparaaen, yugon “kalpanaa”

·

ajar

rahe yah sanskaaron kee jyot-akhandit

·

-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

सकल

विश्व में फैली चारों ओर जीव हित।

मंगलकारी

मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित।

जब-जब

आती पाप-लोभ की बाढ़ जगत में

नव-दुर्गा

तब प्राण हमारे करती रक्षित।

मनता

जब नवरात्रि-पर्व हर साल देश में

दिव्य

प्रभा से मिट जाता सारा तम दूषित।

घटस्थापना, जगराते, माहौल बनाते

जिसमें

होते सकल दुष्टतम भाव विसर्जित।

चलता

दौर उपवास भजन का जब तक घर-घर

माँ

देवी से माँगे जाते, वर मनवांछित।

देशबंधुओं, नाम देश का पर्वों

से ही

विश्व-फ़लक

पर स्वर्ण अक्षरों में है अंकित।

अमर

रहें ये परम्पराएँ, युगों “कल्पना”

अजर

रहे यह संस्कारों की ज्योत-अखंडित।

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗