कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १२८ / २०४ № 128 of 204 रचना १२८ / २०४
२६ जून २०१६ 26 June 2016 २६ जून २०१६

प्यारे शिरीष pyaare shireesh प्यारे शिरीष

रंग बिखरे, बाग निखरे, खिल उठे प्यारे

शिरीष।

गाँव तक चलकर शहर, सब देखने निकले

शिरीष।

खुशनसीबी है कि हैं, परिजन मेरे भी गाँव

में

देके न्यौता ग्रीष्म में, मुझको बुला लेते

शिरीष।

ताप का संताप देता, जेठ जब हर जीव को

तब बहा देते चमन में, सुरभि के झरने शिरीष।

डालियाँ नाज़ुक हैं इनकी, पर इरादे वज्र से

नाजनीनों को झुलाते, झूल बन, भोले शिरीष।

जल जलाशय दें न दें, परवा इन्हें होती

नहीं

बल्कि अपने दम पे मौसम, नम बना देते शिरीष।

लख अतुल सौन्दर्य इनका, दौड़ती हर लेखनी

और कविताओं में गुंथते, काव्य के गहने

शिरीष।

मन नहीं होता कि वापस, छोड़ इन्हें जाऊँ

शहर

कब मिलें फिर ‘कल्पना’ ये, आज के बिछड़े शिरीष।

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

rang bikhare, baag nikhare, khil uthe pyaare

shireesh

·

gaanv tak chalakar shahar, sab dekhane nikale

shireesh

·

khushanaseebee hai ki hain, parijan mere bhee gaanv

men

·

deke nyautaa greeshm men, mujhako bulaa lete

shireesh

·

taap kaa santaap detaa, jeth jab har jeew ko

·

tab bahaa dete chaman men, surabhi ke jharane shireesh

·

daaliyaan naazuk hain inakee, par iraade wajr se

·

naajaneenon ko jhulaate, jhool ban, bhole shireesh

·

jal jalaashay den n den, parawaa inhen hotee

naheen

·

balki apane dam pe mausam, nam banaa dete shireesh

·

lakh atul saundary inakaa, daudatee har lekhanee

·

aur kawitaaon men gunthate, kaavy ke gahane

shireesh

·

man naheen hotaa ki waapas, chod inhen jaaoon

shahar

·

kab milen phir ‘kalpanaa’ ye, aaj ke bichade shireesh

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

रंग बिखरे, बाग निखरे, खिल उठे प्यारे

शिरीष।

गाँव तक चलकर शहर, सब देखने निकले

शिरीष।

खुशनसीबी है कि हैं, परिजन मेरे भी गाँव

में

देके न्यौता ग्रीष्म में, मुझको बुला लेते

शिरीष।

ताप का संताप देता, जेठ जब हर जीव को

तब बहा देते चमन में, सुरभि के झरने शिरीष।

डालियाँ नाज़ुक हैं इनकी, पर इरादे वज्र से

नाजनीनों को झुलाते, झूल बन, भोले शिरीष।

जल जलाशय दें न दें, परवा इन्हें होती

नहीं

बल्कि अपने दम पे मौसम, नम बना देते शिरीष।

लख अतुल सौन्दर्य इनका, दौड़ती हर लेखनी

और कविताओं में गुंथते, काव्य के गहने

शिरीष।

मन नहीं होता कि वापस, छोड़ इन्हें जाऊँ

शहर

कब मिलें फिर ‘कल्पना’ ये, आज के बिछड़े शिरीष।

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗