कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १२९ / २०५ № 129 of 205 रचना १२९ / २०५
२६ जून २०१६ 26 June 2016 २६ जून २०१६

प्यारे शिरीष pyaare shireesh प्यारे शिरीष

रंग बिखरे, बाग निखरे, खिल उठे प्यारे

शिरीष।

॥

गाँव तक चलकर शहर, सब देखने निकले

शिरीष।

॥

खुशनसीबी है कि हैं, परिजन मेरे भी गाँव

में

॥

देके न्यौता ग्रीष्म में, मुझको बुला लेते

शिरीष।

॥

ताप का संताप देता, जेठ जब हर जीव को

॥

तब बहा देते चमन में, सुरभि के झरने शिरीष।

॥

डालियाँ नाज़ुक हैं इनकी, पर इरादे वज्र से

॥

नाजनीनों को झुलाते, झूल बन, भोले शिरीष।

॥

जल जलाशय दें न दें, परवा इन्हें होती

नहीं

॥

बल्कि अपने दम पे मौसम, नम बना देते शिरीष।

॥

लख अतुल सौन्दर्य इनका, दौड़ती हर लेखनी

॥

और कविताओं में गुंथते, काव्य के गहने

शिरीष।

॥

मन नहीं होता कि वापस, छोड़ इन्हें जाऊँ

शहर

॥

कब मिलें फिर ‘कल्पना’ ये, आज के बिछड़े शिरीष।

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

rang bikhare, baag nikhare, khil uthe pyaare

shireesh

·

gaanv tak chalakar shahar, sab dekhane nikale

shireesh

·

khushanaseebee hai ki hain, parijan mere bhee gaanv

men

·

deke nyautaa greeshm men, mujhako bulaa lete

shireesh

·

taap kaa santaap detaa, jeth jab har jeew ko

·

tab bahaa dete chaman men, surabhi ke jharane shireesh

·

daaliyaan naazuk hain inakee, par iraade wajr se

·

naajaneenon ko jhulaate, jhool ban, bhole shireesh

·

jal jalaashay den n den, parawaa inhen hotee

naheen

·

balki apane dam pe mausam, nam banaa dete shireesh

·

lakh atul saundary inakaa, daudatee har lekhanee

·

aur kawitaaon men gunthate, kaavy ke gahane

shireesh

·

man naheen hotaa ki waapas, chod inhen jaaoon

shahar

·

kab milen phir ‘kalpanaa’ ye, aaj ke bichade shireesh

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

रंग बिखरे, बाग निखरे, खिल उठे प्यारे

शिरीष।

॥

गाँव तक चलकर शहर, सब देखने निकले

शिरीष।

॥

खुशनसीबी है कि हैं, परिजन मेरे भी गाँव

में

॥

देके न्यौता ग्रीष्म में, मुझको बुला लेते

शिरीष।

॥

ताप का संताप देता, जेठ जब हर जीव को

॥

तब बहा देते चमन में, सुरभि के झरने शिरीष।

॥

डालियाँ नाज़ुक हैं इनकी, पर इरादे वज्र से

॥

नाजनीनों को झुलाते, झूल बन, भोले शिरीष।

॥

जल जलाशय दें न दें, परवा इन्हें होती

नहीं

॥

बल्कि अपने दम पे मौसम, नम बना देते शिरीष।

॥

लख अतुल सौन्दर्य इनका, दौड़ती हर लेखनी

॥

और कविताओं में गुंथते, काव्य के गहने

शिरीष।

॥

मन नहीं होता कि वापस, छोड़ इन्हें जाऊँ

शहर

॥

कब मिलें फिर ‘कल्पना’ ये, आज के बिछड़े शिरीष।

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗