कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १२५ / २०५ № 125 of 205 रचना १२५ / २०५
१६ अप्रैल २०१६ 16 April 2016 १६ अप्रैल २०१६

फूल बेला के बिना phool belaa ke binaa फूल बेला के बिना

कंत

लौटा फूल बेला के बिना

॥

कामिनी

सँवरी नहीं गजरे बिना

॥

किस

तरह स्वीकार कर ले मानिनी

॥

और

कोई फूल मन भाए बिना

॥

रह

गई माला अधूरी भाव की

॥

गुंथ

न पाई प्रेम के धागे बिना

॥

राह

तकता ही रहा बेला उधर

॥

रात

इधर गुज़री प्रणय-पल के बिना

॥

देख

फीके रंग ऐसे प्यार के

॥

घन

गए घर लौटकर बरसे बिना

॥

चल

पड़ी सुरभित हवा मायूस हो

॥

बाग

वापस ख़ुशबुएँ बाँटे बिना

॥

कंत

बोला मान भी जाओ प्रिये

॥

अब

न आऊँगा कभी बेले बिना

॥

‘कल्पना’ सुन बंद कलियाँ खिल गईं

॥

भोर

का तारा-गगन देखे बिना

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

kant

lautaa phool belaa ke binaa

·

kaaminee

sanvaree naheen gajare binaa

·

kis

tarah sveekaar kar le maaninee

·

aur

koee phool man bhaae binaa

·

rah

gaee maalaa adhooree bhaaw kee

·

gunth

n paaee prem ke dhaage binaa

·

raah

takataa hee rahaa belaa udhar

·

raat

idhar guzaree pranay-pal ke binaa

·

dekh

pheeke rang aise pyaar ke

·

ghan

gae ghar lautakar barase binaa

·

chal

padee surabhit hawaa maayoos ho

·

baag

waapas kushabuen baante binaa

·

kant

bolaa maan bhee jaao priye

·

ab

n aaoongaa kabhee bele binaa

·

‘kalpanaa’ sun band kaliyaan khil gaeen

·

bhor

kaa taaraa-gagan dekhe binaa

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

कंत

लौटा फूल बेला के बिना

॥

कामिनी

सँवरी नहीं गजरे बिना

॥

किस

तरह स्वीकार कर ले मानिनी

॥

और

कोई फूल मन भाए बिना

॥

रह

गई माला अधूरी भाव की

॥

गुंथ

न पाई प्रेम के धागे बिना

॥

राह

तकता ही रहा बेला उधर

॥

रात

इधर गुज़री प्रणय-पल के बिना

॥

देख

फीके रंग ऐसे प्यार के

॥

घन

गए घर लौटकर बरसे बिना

॥

चल

पड़ी सुरभित हवा मायूस हो

॥

बाग

वापस ख़ुशबुएँ बाँटे बिना

॥

कंत

बोला मान भी जाओ प्रिये

॥

अब

न आऊँगा कभी बेले बिना

॥

‘कल्पना’ सुन बंद कलियाँ खिल गईं

॥

भोर

का तारा-गगन देखे बिना

॥

-कल्पना रामानी

॥

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗