कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १०२ / २०५ № 102 of 205 रचना १०२ / २०५
१७ अगस्त २०१५ 17 August 2015 १७ अगस्त २०१५

ऋतु स्वतंत्रता की है riitu svatantrataa kee hai ऋतु स्वतंत्रता की है

फना

हुईं गुलामियाँ, ये ऋतु स्वतन्त्रता की है

॥

अमन

की बात बोलिए, कि प्रात, वंदना की है

॥

लपेट

लोभ, छल-कपट, बिछी हुई हैं गोटियाँ

॥

न पस्त जीत हो कि ये, बिसात, दासता की है

॥

मिटे

जो देश के लिए, शहीद, उनकी याद में

॥

जलाएँ

इक दिया पुनः, ये रात प्रार्थना की है

॥

रहें

न वे अपूर्ण अब,

स्वतंत्र राजतंत्र में

॥

जो

ख्वाब हर सपूत के,

जो आस हर सुता की है

॥

भुलाके

द्वेष-क्लेश सब,

करें नमन निशान को

॥

सुयोग

से मिली हमें,

ये भू परम्परा की है

॥

सदय

बनें, सुदृढ़ बनें, हृदय उतार लें चलो

॥

हवाओं

में घुली हुई जो सीख हर ऋचा की है

॥

करें

न अंध अनुकरण, विदेशी रीति-नीति का

॥

स्वदेश

की पुकार ये, गुहार माँ धरा की है

॥

रुकें

न पग प्रयास के, झुके न अब ध्वजा कभी

॥

बनी

रहे स्वतन्त्रता, ये चाह ‘कल्पना’ की है

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

phanaa

hueen gulaamiyaan, ye riitu svatantrataa kee hai

·

aman

kee baat bolie, ki praat, wandanaa kee hai

·

lapet

lobh, chal-kapat, bichee huee hain gotiyaan

·

n past jeet ho ki ye, bisaat, daasataa kee hai

·

mite

jo desh ke lie, shaheed, unakee yaad men

·

jalaaen

ik diyaa punah, ye raat praarthanaa kee hai

·

rahen

n we apoorn ab,

svatantr raajatantr men

·

jo

khvaab har sapoot ke,

jo aas har sutaa kee hai

·

bhulaake

dvesh-klesh sab,

karen naman nishaan ko

·

suyog

se milee hamen,

ye bhoo paramparaa kee hai

·

saday

banen, sudriiढ़ banen, hriiday utaar len chalo

·

hawaaon

men ghulee huee jo seekh har riichaa kee hai

·

karen

n andh anukaran, wideshee reeti-neeti kaa

·

svadesh

kee pukaar ye, guhaar maan dharaa kee hai

·

ruken

n pag prayaas ke, jhuke n ab dhvajaa kabhee

·

banee

rahe svatantrataa, ye chaah ‘kalpanaa’ kee hai

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

फना

हुईं गुलामियाँ, ये ऋतु स्वतन्त्रता की है

॥

अमन

की बात बोलिए, कि प्रात, वंदना की है

॥

लपेट

लोभ, छल-कपट, बिछी हुई हैं गोटियाँ

॥

न पस्त जीत हो कि ये, बिसात, दासता की है

॥

मिटे

जो देश के लिए, शहीद, उनकी याद में

॥

जलाएँ

इक दिया पुनः, ये रात प्रार्थना की है

॥

रहें

न वे अपूर्ण अब,

स्वतंत्र राजतंत्र में

॥

जो

ख्वाब हर सपूत के,

जो आस हर सुता की है

॥

भुलाके

द्वेष-क्लेश सब,

करें नमन निशान को

॥

सुयोग

से मिली हमें,

ये भू परम्परा की है

॥

सदय

बनें, सुदृढ़ बनें, हृदय उतार लें चलो

॥

हवाओं

में घुली हुई जो सीख हर ऋचा की है

॥

करें

न अंध अनुकरण, विदेशी रीति-नीति का

॥

स्वदेश

की पुकार ये, गुहार माँ धरा की है

॥

रुकें

न पग प्रयास के, झुके न अब ध्वजा कभी

॥

बनी

रहे स्वतन्त्रता, ये चाह ‘कल्पना’ की है

॥

-कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗