कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १०१ / २०४ № 101 of 204 रचना १०१ / २०४
१७ अगस्त २०१५ 17 August 2015 १७ अगस्त २०१५

ऋतु स्वतंत्रता की है riitu svatantrataa kee hai ऋतु स्वतंत्रता की है

फना

हुईं गुलामियाँ, ये ऋतु स्वतन्त्रता की है

अमन

की बात बोलिए, कि प्रात, वंदना की है

लपेट

लोभ, छल-कपट, बिछी हुई हैं गोटियाँ

न पस्त जीत हो कि ये, बिसात, दासता की है

मिटे

जो देश के लिए, शहीद, उनकी याद में

जलाएँ

इक दिया पुनः, ये रात प्रार्थना की है

रहें

न वे अपूर्ण अब,

स्वतंत्र राजतंत्र में

जो

ख्वाब हर सपूत के,

जो आस हर सुता की है

भुलाके

द्वेष-क्लेश सब,

करें नमन निशान को

सुयोग

से मिली हमें,

ये भू परम्परा की है

सदय

बनें, सुदृढ़ बनें, हृदय उतार लें चलो

हवाओं

में घुली हुई जो सीख हर ऋचा की है

करें

न अंध अनुकरण, विदेशी रीति-नीति का

स्वदेश

की पुकार ये, गुहार माँ धरा की है

रुकें

न पग प्रयास के, झुके न अब ध्वजा कभी

बनी

रहे स्वतन्त्रता, ये चाह ‘कल्पना’ की है

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

phanaa

hueen gulaamiyaan, ye riitu svatantrataa kee hai

·

aman

kee baat bolie, ki praat, wandanaa kee hai

·

lapet

lobh, chal-kapat, bichee huee hain gotiyaan

·

n past jeet ho ki ye, bisaat, daasataa kee hai

·

mite

jo desh ke lie, shaheed, unakee yaad men

·

jalaaen

ik diyaa punah, ye raat praarthanaa kee hai

·

rahen

n we apoorn ab,

svatantr raajatantr men

·

jo

khvaab har sapoot ke,

jo aas har sutaa kee hai

·

bhulaake

dvesh-klesh sab,

karen naman nishaan ko

·

suyog

se milee hamen,

ye bhoo paramparaa kee hai

·

saday

banen, sudriiढ़ banen, hriiday utaar len chalo

·

hawaaon

men ghulee huee jo seekh har riichaa kee hai

·

karen

n andh anukaran, wideshee reeti-neeti kaa

·

svadesh

kee pukaar ye, guhaar maan dharaa kee hai

·

ruken

n pag prayaas ke, jhuke n ab dhvajaa kabhee

·

banee

rahe svatantrataa, ye chaah ‘kalpanaa’ kee hai

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

फना

हुईं गुलामियाँ, ये ऋतु स्वतन्त्रता की है

अमन

की बात बोलिए, कि प्रात, वंदना की है

लपेट

लोभ, छल-कपट, बिछी हुई हैं गोटियाँ

न पस्त जीत हो कि ये, बिसात, दासता की है

मिटे

जो देश के लिए, शहीद, उनकी याद में

जलाएँ

इक दिया पुनः, ये रात प्रार्थना की है

रहें

न वे अपूर्ण अब,

स्वतंत्र राजतंत्र में

जो

ख्वाब हर सपूत के,

जो आस हर सुता की है

भुलाके

द्वेष-क्लेश सब,

करें नमन निशान को

सुयोग

से मिली हमें,

ये भू परम्परा की है

सदय

बनें, सुदृढ़ बनें, हृदय उतार लें चलो

हवाओं

में घुली हुई जो सीख हर ऋचा की है

करें

न अंध अनुकरण, विदेशी रीति-नीति का

स्वदेश

की पुकार ये, गुहार माँ धरा की है

रुकें

न पग प्रयास के, झुके न अब ध्वजा कभी

बनी

रहे स्वतन्त्रता, ये चाह ‘कल्पना’ की है

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗