ऋतु स्वतंत्रता की है riitu svatantrataa kee hai ऋतु स्वतंत्रता की है
फना
हुईं गुलामियाँ, ये ऋतु स्वतन्त्रता की है
अमन
की बात बोलिए, कि प्रात, वंदना की है
लपेट
लोभ, छल-कपट, बिछी हुई हैं गोटियाँ
न पस्त जीत हो कि ये, बिसात, दासता की है
मिटे
जो देश के लिए, शहीद, उनकी याद में
जलाएँ
इक दिया पुनः, ये रात प्रार्थना की है
रहें
न वे अपूर्ण अब,
स्वतंत्र राजतंत्र में
जो
ख्वाब हर सपूत के,
जो आस हर सुता की है
भुलाके
द्वेष-क्लेश सब,
करें नमन निशान को
सुयोग
से मिली हमें,
ये भू परम्परा की है
सदय
बनें, सुदृढ़ बनें, हृदय उतार लें चलो
हवाओं
में घुली हुई जो सीख हर ऋचा की है
करें
न अंध अनुकरण, विदेशी रीति-नीति का
स्वदेश
की पुकार ये, गुहार माँ धरा की है
रुकें
न पग प्रयास के, झुके न अब ध्वजा कभी
बनी
रहे स्वतन्त्रता, ये चाह ‘कल्पना’ की है
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
phanaa
hueen gulaamiyaan, ye riitu svatantrataa kee hai
aman
kee baat bolie, ki praat, wandanaa kee hai
lapet
lobh, chal-kapat, bichee huee hain gotiyaan
n past jeet ho ki ye, bisaat, daasataa kee hai
mite
jo desh ke lie, shaheed, unakee yaad men
jalaaen
ik diyaa punah, ye raat praarthanaa kee hai
rahen
n we apoorn ab,
svatantr raajatantr men
jo
khvaab har sapoot ke,
jo aas har sutaa kee hai
bhulaake
dvesh-klesh sab,
karen naman nishaan ko
suyog
se milee hamen,
ye bhoo paramparaa kee hai
saday
banen, sudriiढ़ banen, hriiday utaar len chalo
hawaaon
men ghulee huee jo seekh har riichaa kee hai
karen
n andh anukaran, wideshee reeti-neeti kaa
svadesh
kee pukaar ye, guhaar maan dharaa kee hai
ruken
n pag prayaas ke, jhuke n ab dhvajaa kabhee
banee
rahe svatantrataa, ye chaah ‘kalpanaa’ kee hai
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
फना
हुईं गुलामियाँ, ये ऋतु स्वतन्त्रता की है
अमन
की बात बोलिए, कि प्रात, वंदना की है
लपेट
लोभ, छल-कपट, बिछी हुई हैं गोटियाँ
न पस्त जीत हो कि ये, बिसात, दासता की है
मिटे
जो देश के लिए, शहीद, उनकी याद में
जलाएँ
इक दिया पुनः, ये रात प्रार्थना की है
रहें
न वे अपूर्ण अब,
स्वतंत्र राजतंत्र में
जो
ख्वाब हर सपूत के,
जो आस हर सुता की है
भुलाके
द्वेष-क्लेश सब,
करें नमन निशान को
सुयोग
से मिली हमें,
ये भू परम्परा की है
सदय
बनें, सुदृढ़ बनें, हृदय उतार लें चलो
हवाओं
में घुली हुई जो सीख हर ऋचा की है
करें
न अंध अनुकरण, विदेशी रीति-नीति का
स्वदेश
की पुकार ये, गुहार माँ धरा की है
रुकें
न पग प्रयास के, झुके न अब ध्वजा कभी
बनी
रहे स्वतन्त्रता, ये चाह ‘कल्पना’ की है
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी