मेरा प्यार मुझसे जुदा न हो meraa pyaar mujhase judaa n ho मेरा प्यार मुझसे जुदा न हो
मेरी
एक छोटी सी भूल की,
है ये इल्तिज़ा कि सज़ा न हो।
जो
सज़ा भी हो तो मेरे खुदा, मेरा
प्यार मुझसे जुदा न हो।
बिना
उसके फीके हैं राग सब,
न लुभाती कोई भी रागिनी
है
अधूरा सुर मेरे गीत का,
जहाँ साथ उसका मिला न हो।
वो
नहीं अगर मेरे पास तो, कटे
तारे गिन मेरी हर निशा
कोई
पल गुज़रता नहीं कि जब, उसे
याद मैंने किया न हो।
मैं
हूँ सोचती बनूँ मानिनी,
वो मनाए मुझको बस एक बार
है ये डर मगर कि मेरी तरह,
कहीं वो भी ज़िद पे अड़ा न हो।
नहीं
गम मुझे मेरे मन को वो, क्यों
न आज तक है समझ सका
मेरा
मन तो है यही चाहता, कभी
मुझसे उसको गिला न हो।
उसे
ढूँढते ढली साँझ ये, तो भी आस की है किरण अभी
इन अँधेरों में मुझे थामने, किसी ओट में वो छिपा न हो।
है
तमन्ना बस यही “कल्पना”,
वो नज़र में हो जियूँ या मरूँ
नहीं
मुक्त होगी ये रूह भी,
जो उसी के हाथों विदा न हो।
-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
meree
ek chotee see bhool kee,
hai ye iltizaa ki sazaa n ho
jo
sazaa bhee ho to mere khudaa, meraa
pyaar mujhase judaa n ho
binaa
usake pheeke hain raag sab,
n lubhaatee koee bhee raaginee
hai
adhooraa sur mere geet kaa,
jahaan saath usakaa milaa n ho
wo
naheen agar mere paas to, kate
taare gin meree har nishaa
koee
pal guzarataa naheen ki jab, use
yaad mainne kiyaa n ho
main
hoon sochatee banoon maaninee,
wo manaae mujhako bas ek baar
hai ye dar magar ki meree tarah,
kaheen wo bhee zid pe adaa n ho
naheen
gam mujhe mere man ko wo, kyon
n aaj tak hai samajh sakaa
meraa
man to hai yahee chaahataa, kabhee
mujhase usako gilaa n ho
use
dhoondhate dhalee saanjh ye, to bhee aas kee hai kiran abhee
in andheron men mujhe thaamane, kisee ot men wo chipaa n ho
hai
tamannaa bas yahee “kalpanaa”,
wo nazar men ho jiyoon yaa maroon
naheen
mukt hogee ye rooh bhee,
jo usee ke haathon widaa n ho
-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
मेरी
एक छोटी सी भूल की,
है ये इल्तिज़ा कि सज़ा न हो।
जो
सज़ा भी हो तो मेरे खुदा, मेरा
प्यार मुझसे जुदा न हो।
बिना
उसके फीके हैं राग सब,
न लुभाती कोई भी रागिनी
है
अधूरा सुर मेरे गीत का,
जहाँ साथ उसका मिला न हो।
वो
नहीं अगर मेरे पास तो, कटे
तारे गिन मेरी हर निशा
कोई
पल गुज़रता नहीं कि जब, उसे
याद मैंने किया न हो।
मैं
हूँ सोचती बनूँ मानिनी,
वो मनाए मुझको बस एक बार
है ये डर मगर कि मेरी तरह,
कहीं वो भी ज़िद पे अड़ा न हो।
नहीं
गम मुझे मेरे मन को वो, क्यों
न आज तक है समझ सका
मेरा
मन तो है यही चाहता, कभी
मुझसे उसको गिला न हो।
उसे
ढूँढते ढली साँझ ये, तो भी आस की है किरण अभी
इन अँधेरों में मुझे थामने, किसी ओट में वो छिपा न हो।
है
तमन्ना बस यही “कल्पना”,
वो नज़र में हो जियूँ या मरूँ
नहीं
मुक्त होगी ये रूह भी,
जो उसी के हाथों विदा न हो।
-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
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-कल्पना रामानी