बाल-श्रम /लघुकथा baal-shram /laghukathaa बाल-श्रम /लघुकथा
“यहाँ क्यों खड़े हो बच्चे,
तुम्हें क्या चाहिए?” कहते हुए गाँव के दो कमरों वाले
उस एकमात्र सरकारी विद्या-मंदिर के एक मात्र शिक्षक रमाकांत ने सवालिया नज़रों से
उस भिखारी से दिखने वाले बालक से पूछा।
“कुछ भोजन मिलेगा बाबूजी?
सुबह से भूखा हूँ”। उसने सामने ही पाठशाला के आँगन में भोजन करते हुए बच्चों को
देखते हुए कहा।
“देखो, अगर तुम
यहाँ प्रतिदिन पढ़ने आओगे तो भोजन, कपड़े,
किताबें, सब मुफ्त मिलेगा,
“yahaan kyon khade ho bachche,
tumhen kyaa chaahie?” kahate hue gaanv ke do kamaron waale
us ekamaatr sarakaaree widyaa-mandir ke ek maatr shikshak ramaakaant ne sawaaliyaa nazaron se
us bhikhaaree se dikhane waale baalak se poochaa
“kuch bhojan milegaa baaboojee?
subah se bhookhaa hoon” usane saamane hee paathashaalaa ke aangan men bhojan karate hue bachchon ko
dekhate hue kahaa
“dekho, agar tum
yahaan pratidin pढ़ne aaoge to bhojan, kapade,
kitaaben, sab mupht milegaa,
“यहाँ क्यों खड़े हो बच्चे,
तुम्हें क्या चाहिए?” कहते हुए गाँव के दो कमरों वाले
उस एकमात्र सरकारी विद्या-मंदिर के एक मात्र शिक्षक रमाकांत ने सवालिया नज़रों से
उस भिखारी से दिखने वाले बालक से पूछा।
“कुछ भोजन मिलेगा बाबूजी?
सुबह से भूखा हूँ”। उसने सामने ही पाठशाला के आँगन में भोजन करते हुए बच्चों को
देखते हुए कहा।
“देखो, अगर तुम
यहाँ प्रतिदिन पढ़ने आओगे तो भोजन, कपड़े,
किताबें, सब मुफ्त मिलेगा,