कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कहानी Story कहाणी · रचना ४० / ११४ № 40 of 114 रचना ४० / ११४
२२ फ़रवरी २०१७ 22 February 2017 २२ फ़रवरी २०१७

कसाईखाना kasaaeekhaanaa कसाईखाना

विशु के बापू,

ज़रा सुनना तो...नानकी ने बान की झोल खाती हुई खटिया पर सोए बेटे विशाल को मैली-सी

पुरानी चादर उढ़ाते हुए आवाज़ लगाई।

“हाँ कहो क्या बात है?”

कोठरी के बाहर ही टाट के परदे की आड़ में नहाते हुए मंगलू ने जवाब दिया।

-आज इन दो बूढ़ी हो चुकी बकरियों और एक बछड़े को

कसाईखाने दे आओ...कहाँ सँभालूँ इन सबको, बाड़े

में जगह कम पड़ने लगी है, हर साल

दो से चार हो जाती हैं। इनका पेट

wishu ke baapoo,

zaraa sunanaa tonaanakee ne baan kee jhol khaatee huee khatiyaa par soe bete wishaal ko mailee-see

puraanee chaadar uढ़aate hue aawaaz lagaaee

·

“haan kaho kyaa baat hai?”

kotharee ke baahar hee taat ke parade kee aad men nahaate hue mangaloo ne jawaab diyaa

·

-aaj in do booढ़ee ho chukee bakariyon aur ek bachade ko

kasaaeekhaane de aaokahaan sanbhaaloon in sabako, baade

men jagah kam padane lagee hai, har saal

do se chaar ho jaatee hain inakaa pet

विशु के बापू,

ज़रा सुनना तो...नानकी ने बान की झोल खाती हुई खटिया पर सोए बेटे विशाल को मैली-सी

पुरानी चादर उढ़ाते हुए आवाज़ लगाई।

“हाँ कहो क्या बात है?”

कोठरी के बाहर ही टाट के परदे की आड़ में नहाते हुए मंगलू ने जवाब दिया।

-आज इन दो बूढ़ी हो चुकी बकरियों और एक बछड़े को

कसाईखाने दे आओ...कहाँ सँभालूँ इन सबको, बाड़े

में जगह कम पड़ने लगी है, हर साल

दो से चार हो जाती हैं। इनका पेट

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗