कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कुण्डलिया Kundaliya कुंडलिया · रचना ३२ / ६३ № 32 of 63 रचना ३२ / ६३
२७ मई २०१३ 27 May 2013 २७ मई २०१३

गर्मी का यह रूप garmee kaa yah roop गर्मी का यह रूप

पग लिपटे बंजर धरा, तन झुलसाती धूप।

हलक सुखाता जा रहा, गर्मी का यह रूप।

गर्मी का यह रूप, गजब तेवर दिखलाए

रह रह करती घात, हवा कातिल मुस्काए।

नन्हीं सी यह जान, प्यास से कैसे निपटे

तन झुलसाती धूप, धरा बंजर पग लिपटे।

जल-संरक्षण का भला, कहाँ किसी को भान।

पल पल पानी हो रहा, भू से अंतर्ध्यान।

भू से अंतर्ध्यान, सिर्फ है दोहन जारी

शक्त उर्वरा भूमि, हो चली बंजर सारी।

ढूँढ रहे

pag lipate banjar dharaa, tan jhulasaatee dhoop

halak sukhaataa jaa rahaa, garmee kaa yah roop

garmee kaa yah roop, gajab tewar dikhalaae

rah rah karatee ghaat, hawaa kaatil muskaae

nanheen see yah jaan, pyaas se kaise nipate

tan jhulasaatee dhoop, dharaa banjar pag lipate

·

jal-sanrakshan kaa bhalaa, kahaan kisee ko bhaan

·

pal pal paanee ho rahaa, bhoo se antardhyaan

·

bhoo se antardhyaan, sirph hai dohan jaaree

·

shakt urvaraa bhoomi, ho chalee banjar saaree

·

dhoondh rahe

पग लिपटे बंजर धरा, तन झुलसाती धूप।

हलक सुखाता जा रहा, गर्मी का यह रूप।

गर्मी का यह रूप, गजब तेवर दिखलाए

रह रह करती घात, हवा कातिल मुस्काए।

नन्हीं सी यह जान, प्यास से कैसे निपटे

तन झुलसाती धूप, धरा बंजर पग लिपटे।

जल-संरक्षण का भला, कहाँ किसी को भान।

पल पल पानी हो रहा, भू से अंतर्ध्यान।

भू से अंतर्ध्यान, सिर्फ है दोहन जारी

शक्त उर्वरा भूमि, हो चली बंजर सारी।

ढूँढ रहे

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗