गर्मी का यह रूप garmee kaa yah roop गर्मी का यह रूप
पग लिपटे बंजर धरा, तन झुलसाती धूप।
हलक सुखाता जा रहा, गर्मी का यह रूप।
गर्मी का यह रूप, गजब तेवर दिखलाए
रह रह करती घात, हवा कातिल मुस्काए।
नन्हीं सी यह जान, प्यास से कैसे निपटे
तन झुलसाती धूप, धरा बंजर पग लिपटे।
जल-संरक्षण का भला, कहाँ किसी को भान।
पल पल पानी हो रहा, भू से अंतर्ध्यान।
भू से अंतर्ध्यान, सिर्फ है दोहन जारी
शक्त उर्वरा भूमि, हो चली बंजर सारी।
ढूँढ रहे
pag lipate banjar dharaa, tan jhulasaatee dhoop
halak sukhaataa jaa rahaa, garmee kaa yah roop
garmee kaa yah roop, gajab tewar dikhalaae
rah rah karatee ghaat, hawaa kaatil muskaae
nanheen see yah jaan, pyaas se kaise nipate
tan jhulasaatee dhoop, dharaa banjar pag lipate
jal-sanrakshan kaa bhalaa, kahaan kisee ko bhaan
pal pal paanee ho rahaa, bhoo se antardhyaan
bhoo se antardhyaan, sirph hai dohan jaaree
shakt urvaraa bhoomi, ho chalee banjar saaree
dhoondh rahe
पग लिपटे बंजर धरा, तन झुलसाती धूप।
हलक सुखाता जा रहा, गर्मी का यह रूप।
गर्मी का यह रूप, गजब तेवर दिखलाए
रह रह करती घात, हवा कातिल मुस्काए।
नन्हीं सी यह जान, प्यास से कैसे निपटे
तन झुलसाती धूप, धरा बंजर पग लिपटे।
जल-संरक्षण का भला, कहाँ किसी को भान।
पल पल पानी हो रहा, भू से अंतर्ध्यान।
भू से अंतर्ध्यान, सिर्फ है दोहन जारी
शक्त उर्वरा भूमि, हो चली बंजर सारी।
ढूँढ रहे