कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १६ / १६४ № 16 of 164 रचना १६ / १६४
२३ मई २०१३ 23 May 2013 २३ मई २०१३

छाँव निगलकर हँसता सूरज chaanv nigalakar hansataa sooraj छाँव निगलकर हँसता सूरज

छाँव निगलकर हँसता सूरज,

॥

उगल रहा है धूप।

॥

शीतलता को रखा कैद में,

गर्मी लाया साथ।

तप्त दुपहरी रानी बनकर,

बाँट रही सौगात।

फ्रूट-चाट, कुल्फी, ठंडाई,

सभी सुहाने रूप।

॥

रातें छोटी दिन हैं लंबे,

लू का बढ़ा प्रकोप।

घने पेड़ भी तपे आग से,

शीत हवा का लोप।

चीं चीं, चूँ चूँ, काँव काँव सब,

ढूंढ रहे नल कूप।

॥

सड़क किनारे ठेले वाले,

राहत लिए खड़े।

जन-जन के तर कंठ कर रहे,

जल से भरे घड़े।

दही,

chaanv nigalakar hansataa sooraj,

·

ugal rahaa hai dhoop

·

sheetalataa ko rakhaa kaid men,

garmee laayaa saath

tapt dupaharee raanee banakar,

baant rahee saugaat

phroot-chaat, kulphee, thandaaee,

sabhee suhaane roop

·

raaten chotee din hain lanbe,

loo kaa bढ़aa prakop

ghane ped bhee tape aag se,

sheet hawaa kaa lop

cheen cheen, choon choon, kaanv kaanv sab,

dhoondh rahe nal koop

·

sadak kinaare thele waale,

raahat lie khade

jan-jan ke tar kanth kar rahe,

jal se bhare ghade

dahee,

छाँव निगलकर हँसता सूरज,

॥

उगल रहा है धूप।

॥

शीतलता को रखा कैद में,

गर्मी लाया साथ।

तप्त दुपहरी रानी बनकर,

बाँट रही सौगात।

फ्रूट-चाट, कुल्फी, ठंडाई,

सभी सुहाने रूप।

॥

रातें छोटी दिन हैं लंबे,

लू का बढ़ा प्रकोप।

घने पेड़ भी तपे आग से,

शीत हवा का लोप।

चीं चीं, चूँ चूँ, काँव काँव सब,

ढूंढ रहे नल कूप।

॥

सड़क किनारे ठेले वाले,

राहत लिए खड़े।

जन-जन के तर कंठ कर रहे,

जल से भरे घड़े।

दही,

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗