कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कुण्डलिया Kundaliya कुंडलिया · रचना ६० / ६३ № 60 of 63 रचना ६० / ६३
१८ दिसम्बर २०१९ 18 December 2019 १८ दिसम्बर २०१९

जलते हुए अलाव jalate hue alaaw जलते हुए अलाव

जब से डाला शीत ने, आकर पुनः पड़ाव।

गाँव गाँव दिखने लगे, जलते हुए अलाव।

जलते हुए अलाव, स्वाद मेवों का भाया

गाजर हलवा दूध, सूप ने रंग जमाया।

मावे के मिष्ठान्न, लग रहे अच्छे सबसे

आकर पुनः पड़ाव, शीत ने डाला जबसे।

सूरज देवा आजकल, हो जाते हैं लेट।

भर सर्दी में धूप के, बढ़ा लिए हैं रेट।

बढ़ा लिए हैं रेट, छिपाकर किरणें सारी

हो जाते हैं ओट, न मानें बात हमारी।

करें प्रार्थना ध्यान, और किरणों की सेवा

तब फिर शायद लेट, न आएँ सूरज देवा।

धूप चदरिया बिछ गई, चलो भगाएँ शीत।

दर्शन देने आ गया, दिनकर बनकर मीत।

दिनकर बनकर मीत, चटाई आँगन डालें

बेर और अमरूद, बाँटकर, मिलकर खा लें।

पिंटू, चिंटू, राम, घरों से निकलो भैया

चलो भगाएँ शीत, बिछ रही धूप चदरिया।

jab se daalaa sheet ne, aakar punah padaaw

gaanv gaanv dikhane lage, jalate hue alaaw

jalate hue alaaw, svaad mewon kaa bhaayaa

gaajar halawaa doodh, soop ne rang jamaayaa

maawe ke mishthaann, lag rahe achche sabase

aakar punah padaaw, sheet ne daalaa jabase

·

sooraj dewaa aajakal, ho jaate hain let

bhar sardee men dhoop ke, bढ़aa lie hain ret

bढ़aa lie hain ret, chipaakar kiranen saaree

ho jaate hain ot, n maanen baat hamaaree

karen praarthanaa dhyaan, aur kiranon kee sewaa

tab phir shaayad let, n aaen sooraj dewaa

·

dhoop chadariyaa bich gaee, chalo bhagaaen sheet

darshan dene aa gayaa, dinakar banakar meet

dinakar banakar meet, chataaee aangan daalen

ber aur amarood, baantakar, milakar khaa len

pintoo, chintoo, raam, gharon se nikalo bhaiyaa

chalo bhagaaen sheet, bich rahee dhoop chadariyaa

जब से डाला शीत ने, आकर पुनः पड़ाव।

गाँव गाँव दिखने लगे, जलते हुए अलाव।

जलते हुए अलाव, स्वाद मेवों का भाया

गाजर हलवा दूध, सूप ने रंग जमाया।

मावे के मिष्ठान्न, लग रहे अच्छे सबसे

आकर पुनः पड़ाव, शीत ने डाला जबसे।

सूरज देवा आजकल, हो जाते हैं लेट।

भर सर्दी में धूप के, बढ़ा लिए हैं रेट।

बढ़ा लिए हैं रेट, छिपाकर किरणें सारी

हो जाते हैं ओट, न मानें बात हमारी।

करें प्रार्थना ध्यान, और किरणों की सेवा

तब फिर शायद लेट, न आएँ सूरज देवा।

धूप चदरिया बिछ गई, चलो भगाएँ शीत।

दर्शन देने आ गया, दिनकर बनकर मीत।

दिनकर बनकर मीत, चटाई आँगन डालें

बेर और अमरूद, बाँटकर, मिलकर खा लें।

पिंटू, चिंटू, राम, घरों से निकलो भैया

चलो भगाएँ शीत, बिछ रही धूप चदरिया।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗