बंजारा मन बढ़ चला... banjaaraa man bढ़ chalaa बंजारा मन बढ़ चला...
छंद रचे दोहे रचे, रचे अनगिनत गीत।
मगर हुए सब हाशिये, मन भाया नवगीत।
अंचल-अंचल से घुली, मोहक मधुर सुंगंध।
बोलों में नवगीत के, बसी गाँव की गंध।
भोलापन औ सरलता, सुख दुख की तस्वीर।
नवगीतों से झाँकती, ग्राम्य जनों
की पीर।
नवगीतों की तान में, बसे करुण उद्गार।
झंकृत करते हृदय को, ज्यों वीणा के
तार।
घुलता जब नवगीत में, प्रेम रसों
chand rache dohe rache, rache anaginat geet
magar hue sab haashiye, man bhaayaa nawageet
anchal-anchal se ghulee, mohak madhur sungandh
bolon men nawageet ke, basee gaanv kee gandh
bholaapan au saralataa, sukh dukh kee tasveer
nawageeton se jhaankatee, graamy janon
kee peer
nawageeton kee taan men, base karun udgaar
jhankriit karate hriiday ko, jyon weenaa ke
taar
ghulataa jab nawageet men, prem rason
छंद रचे दोहे रचे, रचे अनगिनत गीत।
मगर हुए सब हाशिये, मन भाया नवगीत।
अंचल-अंचल से घुली, मोहक मधुर सुंगंध।
बोलों में नवगीत के, बसी गाँव की गंध।
भोलापन औ सरलता, सुख दुख की तस्वीर।
नवगीतों से झाँकती, ग्राम्य जनों
की पीर।
नवगीतों की तान में, बसे करुण उद्गार।
झंकृत करते हृदय को, ज्यों वीणा के
तार।
घुलता जब नवगीत में, प्रेम रसों