कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी दोहा Doha दोहो · रचना ११ / ६५ № 11 of 65 रचना ११ / ६५
२२ अक्तूबर २०१२ 22 October 2012 २२ अक्तूबर २०१२

बंजारा मन बढ़ चला... banjaaraa man bढ़ chalaa बंजारा मन बढ़ चला...

छंद रचे दोहे रचे, रचे अनगिनत गीत।

मगर हुए सब हाशिये, मन भाया नवगीत।

अंचल-अंचल से घुली, मोहक मधुर सुंगंध।

बोलों में नवगीत के, बसी गाँव की गंध।

भोलापन औ सरलता, सुख दुख की तस्वीर।

नवगीतों से झाँकती, ग्राम्य जनों

की पीर।

नवगीतों की तान में, बसे करुण उद्गार।

झंकृत करते हृदय को, ज्यों वीणा के

तार।

घुलता जब नवगीत में, प्रेम रसों

chand rache dohe rache, rache anaginat geet

·

magar hue sab haashiye, man bhaayaa nawageet

·

anchal-anchal se ghulee, mohak madhur sungandh

·

bolon men nawageet ke, basee gaanv kee gandh

·

bholaapan au saralataa, sukh dukh kee tasveer

·

nawageeton se jhaankatee, graamy janon

kee peer

·

nawageeton kee taan men, base karun udgaar

·

jhankriit karate hriiday ko, jyon weenaa ke

taar

·

ghulataa jab nawageet men, prem rason

छंद रचे दोहे रचे, रचे अनगिनत गीत।

मगर हुए सब हाशिये, मन भाया नवगीत।

अंचल-अंचल से घुली, मोहक मधुर सुंगंध।

बोलों में नवगीत के, बसी गाँव की गंध।

भोलापन औ सरलता, सुख दुख की तस्वीर।

नवगीतों से झाँकती, ग्राम्य जनों

की पीर।

नवगीतों की तान में, बसे करुण उद्गार।

झंकृत करते हृदय को, ज्यों वीणा के

तार।

घुलता जब नवगीत में, प्रेम रसों

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗