चली मुग्ध भागीरथी chalee mugdh bhaageerathee चली मुग्ध भागीरथी
उच्च हिमालय पार कर, मैदानों की ओर।
चली मुग्ध भागीरथी, होकर भाव विभोर।
गो मुख से निकली चली, वेगमई अविराम।
धरती पर हरिद्वार में, मिला उसे विश्राम।
गंगा से ही विश्व में, भारत की पहचान।
लाखों जन जुटते यहाँ, करते पावन स्नान।
सलिला पाप विनाशिनी, करती रोग निदान।
दुख हरणी,सुख दायिनी, देती जीवन दान।
आए जो इस बार हम, गंगा माँ के
uchch himaalay paar kar, maidaanon kee or
chalee mugdh bhaageerathee, hokar bhaaw wibhor
go mukh se nikalee chalee, wegamaee awiraam
dharatee par haridvaar men, milaa use wishraam
gangaa se hee wishv men, bhaarat kee pahachaan
laakhon jan jutate yahaan, karate paawan snaan
salilaa paap winaashinee, karatee rog nidaan
dukh haranee,sukh daayinee, detee jeewan daan
aae jo is baar ham, gangaa maan ke
उच्च हिमालय पार कर, मैदानों की ओर।
चली मुग्ध भागीरथी, होकर भाव विभोर।
गो मुख से निकली चली, वेगमई अविराम।
धरती पर हरिद्वार में, मिला उसे विश्राम।
गंगा से ही विश्व में, भारत की पहचान।
लाखों जन जुटते यहाँ, करते पावन स्नान।
सलिला पाप विनाशिनी, करती रोग निदान।
दुख हरणी,सुख दायिनी, देती जीवन दान।
आए जो इस बार हम, गंगा माँ के