कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १ / २०४ № 1 of 204 रचना १ / २०४
१४ जून २०१३ 14 June 2013 १४ जून २०१३

गंगा नहाने आ गए//गज़ल// gangaa nahaane aa gae//gazal// गंगा नहाने आ गए//गज़ल//

पाप गठरी सिर धरे, गंगा नहाने आ गए।

जन्म भर का मैल, सलिला में मिलाने आ गए।

ये छिपे रुस्तम कहाते, देश के हैं सभ्य जन

पीढ़ियों को तारने, माँ को मनाने आ गए।

मन चढ़ी कालिख, वसन तन धर धवल बगुले भगत

मंदिरों में राम धुन के गीत गाने आ गए।

रक्त से निर्दोष के, घर बाग सींचे उम्र भर,

रामनामी ओढ़ अब, छींटे छुड़ाने आ गए।

चंद सिक्कों के लिए, बेचा किए अपना ज़मीर

चंद सिक्के भीख दे, दानी कहाने आ गए।

लूटकर धन धान्य घट, भरते रहे ताज़िन्दगी

गंग तीरे धर्म का, लंगर चलाने आ गए।

इन परम पाखंडियों को, दो सुमत भागीरथी

दोष अर्पण कर तुझे, जो मोक्ष पाने आ गए।

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

paap gatharee sir dhare, gangaa nahaane aa gae

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janm bhar kaa mail, salilaa men milaane aa gae

·

ye chipe rustam kahaate, desh ke hain sabhy jan

·

peeढ़iyon ko taarane, maan ko manaane aa gae

·

man chढ़ee kaalikh, wasan tan dhar dhawal bagule bhagat

·

mandiron men raam dhun ke geet gaane aa gae

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rakt se nirdosh ke, ghar baag seenche umr bhar,

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raamanaamee oढ़ ab, cheente chudaane aa gae

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chand sikkon ke lie, bechaa kie apanaa zameer

·

chand sikke bheekh de, daanee kahaane aa gae

·

lootakar dhan dhaany ghat, bharate rahe taazindagee

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gang teere dharm kaa, langar chalaane aa gae

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in param paakhandiyon ko, do sumat bhaageerathee

·

dosh arpan kar tujhe, jo moksh paane aa gae

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- kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

पाप गठरी सिर धरे, गंगा नहाने आ गए।

जन्म भर का मैल, सलिला में मिलाने आ गए।

ये छिपे रुस्तम कहाते, देश के हैं सभ्य जन

पीढ़ियों को तारने, माँ को मनाने आ गए।

मन चढ़ी कालिख, वसन तन धर धवल बगुले भगत

मंदिरों में राम धुन के गीत गाने आ गए।

रक्त से निर्दोष के, घर बाग सींचे उम्र भर,

रामनामी ओढ़ अब, छींटे छुड़ाने आ गए।

चंद सिक्कों के लिए, बेचा किए अपना ज़मीर

चंद सिक्के भीख दे, दानी कहाने आ गए।

लूटकर धन धान्य घट, भरते रहे ताज़िन्दगी

गंग तीरे धर्म का, लंगर चलाने आ गए।

इन परम पाखंडियों को, दो सुमत भागीरथी

दोष अर्पण कर तुझे, जो मोक्ष पाने आ गए।

- कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗