कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ६५ / २०४ № 65 of 204 रचना ६५ / २०४
२० जनवरी २०१५ 20 January 2015 २० जनवरी २०१५

भूखों को रिझाते वे bhookhon ko rijhaate we भूखों को रिझाते वे

भूखों

को रिझाते वे, रोटी की मुनादी से।

प्यासों

को पिलाते हैं, वादों की सुराही से।

ख्वाबों

में गरम गुदड़ी, जिनको न हुई हासिल

ख्वाब

उनके सजाते वे, रेशम की रजाई से।

कुहरा

हो या पाला हो, उनकी हैं सुखद सेजें

फुटपाथ

इन्हें ढँकते, चिथड़ों की चटाई से।

होते

हैं सुखद सर्वे सुखियों के गगन में तब

दो

हाथ दुखी करते, जब बाढ़ सुनामी से।

फसलें

तो उगाते ये, दानों पे दखल उनका

मौत

इनसे गले मिलकर, फुसलाती है फाँसी से।

मरते

हैं या जीते ये, खुदगर्ज़ खबर क्यों लें?

उनको

तो गरज अपनी, खबरों की छपाई से।

--कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

bhookhon

ko rijhaate we, rotee kee munaadee se

·

pyaason

ko pilaate hain, waadon kee suraahee se

·

khvaabon

men garam gudadee, jinako n huee haasil

·

khvaab

unake sajaate we, resham kee rajaaee se

·

kuharaa

ho yaa paalaa ho, unakee hain sukhad sejen

·

phutapaath

inhen dhankate, chithadon kee chataaee se

·

hote

hain sukhad sarve sukhiyon ke gagan men tab

·

do

haath dukhee karate, jab baaढ़ sunaamee se

·

phasalen

to ugaate ye, daanon pe dakhal unakaa

·

maut

inase gale milakar, phusalaatee hai phaansee se

·

marate

hain yaa jeete ye, khudagarz khabar kyon len?

·

unako

to garaj apanee, khabaron kee chapaaee se

·

--kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

भूखों

को रिझाते वे, रोटी की मुनादी से।

प्यासों

को पिलाते हैं, वादों की सुराही से।

ख्वाबों

में गरम गुदड़ी, जिनको न हुई हासिल

ख्वाब

उनके सजाते वे, रेशम की रजाई से।

कुहरा

हो या पाला हो, उनकी हैं सुखद सेजें

फुटपाथ

इन्हें ढँकते, चिथड़ों की चटाई से।

होते

हैं सुखद सर्वे सुखियों के गगन में तब

दो

हाथ दुखी करते, जब बाढ़ सुनामी से।

फसलें

तो उगाते ये, दानों पे दखल उनका

मौत

इनसे गले मिलकर, फुसलाती है फाँसी से।

मरते

हैं या जीते ये, खुदगर्ज़ खबर क्यों लें?

उनको

तो गरज अपनी, खबरों की छपाई से।

--कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗