कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ६६ / २०५ № 66 of 205 रचना ६६ / २०५
२० जनवरी २०१५ 20 January 2015 २० जनवरी २०१५

भूखों को रिझाते वे bhookhon ko rijhaate we भूखों को रिझाते वे

भूखों

को रिझाते वे, रोटी की मुनादी से।

॥

प्यासों

को पिलाते हैं, वादों की सुराही से।

॥

ख्वाबों

में गरम गुदड़ी, जिनको न हुई हासिल

॥

ख्वाब

उनके सजाते वे, रेशम की रजाई से।

॥

कुहरा

हो या पाला हो, उनकी हैं सुखद सेजें

॥

फुटपाथ

इन्हें ढँकते, चिथड़ों की चटाई से।

॥

होते

हैं सुखद सर्वे सुखियों के गगन में तब

॥

दो

हाथ दुखी करते, जब बाढ़ सुनामी से।

॥

फसलें

तो उगाते ये, दानों पे दखल उनका

॥

मौत

इनसे गले मिलकर, फुसलाती है फाँसी से।

॥

मरते

हैं या जीते ये, खुदगर्ज़ खबर क्यों लें?

॥

उनको

तो गरज अपनी, खबरों की छपाई से।

॥

--कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

bhookhon

ko rijhaate we, rotee kee munaadee se

·

pyaason

ko pilaate hain, waadon kee suraahee se

·

khvaabon

men garam gudadee, jinako n huee haasil

·

khvaab

unake sajaate we, resham kee rajaaee se

·

kuharaa

ho yaa paalaa ho, unakee hain sukhad sejen

·

phutapaath

inhen dhankate, chithadon kee chataaee se

·

hote

hain sukhad sarve sukhiyon ke gagan men tab

·

do

haath dukhee karate, jab baaढ़ sunaamee se

·

phasalen

to ugaate ye, daanon pe dakhal unakaa

·

maut

inase gale milakar, phusalaatee hai phaansee se

·

marate

hain yaa jeete ye, khudagarz khabar kyon len?

·

unako

to garaj apanee, khabaron kee chapaaee se

·

--kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

भूखों

को रिझाते वे, रोटी की मुनादी से।

॥

प्यासों

को पिलाते हैं, वादों की सुराही से।

॥

ख्वाबों

में गरम गुदड़ी, जिनको न हुई हासिल

॥

ख्वाब

उनके सजाते वे, रेशम की रजाई से।

॥

कुहरा

हो या पाला हो, उनकी हैं सुखद सेजें

॥

फुटपाथ

इन्हें ढँकते, चिथड़ों की चटाई से।

॥

होते

हैं सुखद सर्वे सुखियों के गगन में तब

॥

दो

हाथ दुखी करते, जब बाढ़ सुनामी से।

॥

फसलें

तो उगाते ये, दानों पे दखल उनका

॥

मौत

इनसे गले मिलकर, फुसलाती है फाँसी से।

॥

मरते

हैं या जीते ये, खुदगर्ज़ खबर क्यों लें?

॥

उनको

तो गरज अपनी, खबरों की छपाई से।

॥

--कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗