कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ६२ / २०४ № 62 of 204 रचना ६२ / २०४
२५ दिसम्बर २०१४ 25 December 2014 २५ दिसम्बर २०१४

भूल जाएगा ज़माना bhool jaaegaa zamaanaa भूल जाएगा ज़माना

पेशावर में १७ दिसंबर २०१४ को आतंकी हमले में मारे गए स्कूली बच्चों के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ भाव

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रौंदकर

मासूम जानें बेफिकर जो क्रूरता

किसलिए

हे ईश! तुमने दी उसे बल-सम्पदा।

शक्ल

से मानव मगर हैं दानवों से बद करम

दिल

नहीं सीने में रखते,

चीरते दिल बेखता।

कर

न पाए हाथ जो बेबस फरिश्तों पर रहम

बेरहम

वे हाथ सारे काट दो मेरे खुदा।

भूल

जाएगा ज़माना दे क्षणिक श्रद्धांजली

पर

सितम का सिर कलम करने बढ़ेगा न्याय क्या?

चैन

क्या मिल पाएगा नन्हें गुलों की रूह को?

काँपती

है रूह भी यह सोचकर अब “कल्पना”!

--कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

peshaawar men 17 disanbar 2014 ko aatankee hamale men maare gae skoolee bachchon ke prati shraddhaanjali svaroop kuch bhaaw

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raundakar

maasoom jaanen bephikar jo kroorataa

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kisalie

he eesh! tumane dee use bal-sampadaa

·

shakl

se maanaw magar hain daanawon se bad karam

·

dil

naheen seene men rakhate,

cheerate dil bekhataa

·

kar

n paae haath jo bebas pharishton par raham

·

beraham

we haath saare kaat do mere khudaa

·

bhool

jaaegaa zamaanaa de kshanik shraddhaanjalee

·

par

sitam kaa sir kalam karane bढ़egaa nyaay kyaa?

·

chain

kyaa mil paaegaa nanhen gulon kee rooh ko?

·

kaanpatee

hai rooh bhee yah sochakar ab “kalpanaa”!

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--kalpanaa raamaanee

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protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

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-kalpanaa raamaanee

पेशावर में १७ दिसंबर २०१४ को आतंकी हमले में मारे गए स्कूली बच्चों के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ भाव

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रौंदकर

मासूम जानें बेफिकर जो क्रूरता

किसलिए

हे ईश! तुमने दी उसे बल-सम्पदा।

शक्ल

से मानव मगर हैं दानवों से बद करम

दिल

नहीं सीने में रखते,

चीरते दिल बेखता।

कर

न पाए हाथ जो बेबस फरिश्तों पर रहम

बेरहम

वे हाथ सारे काट दो मेरे खुदा।

भूल

जाएगा ज़माना दे क्षणिक श्रद्धांजली

पर

सितम का सिर कलम करने बढ़ेगा न्याय क्या?

चैन

क्या मिल पाएगा नन्हें गुलों की रूह को?

काँपती

है रूह भी यह सोचकर अब “कल्पना”!

--कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗