कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १७१ / २०४ № 171 of 204 रचना १७१ / २०४
१७ नवम्बर २०१९ 17 November 2019 १७ नवम्बर २०१९

डालियाँ फूलों भरी daaliyaan phoolon bharee डालियाँ फूलों भरी

जब वनों में गुनगुनातीं, गर्मियाँ फूलों भरी।

पेड़ चम्पा की लुभातीं, डालियाँ फूलों भरी।

शुष्क भू पर ये कतारों में खड़े दरबान से

दृष्ट होते सिर धरे ज्यों, टोपियाँ फूलों भरी।

पीत स्वर्णिम पुष्प खिलते, सब्ज़ रंगी पात सँग

मन चमन को मोह लेतीं, झलकियाँ फूलों भरी।

बाल बच्चों को सुहाता, नाम चम्पक-वन बहुत

जब कथाएँ कह सुनातीं, नानियाँ फूलों भरी।

मुग्ध कवियों ने युगों से, जान महिमा पेड़ की

काव्य ग्रन्थों में रचाईं, पंक्तियाँ फूलों भरी।

पेड़ का हर अंग करता, मुफ्त रोगों का निदान

याद आती हैं पुरातन, सूक्तियाँ फूलों भरी।

सूख जाते पुष्प लेकिन, फैलकर इनकी सुगंध

घूम आती विश्व में भर, झोलियाँ फूलों भरी।

मित्र ये पर्यावरण के, लहलहाते साल भर

कटु हवाओं को सिखाते, बोलियाँ फूलों भरी।

यह धरोहर देश की, रक्खें सुरक्षित “कल्पना”

युग युगों फलती रहें, नव पीढ़ियाँ फूलों भरी।

jab wanon men gunagunaateen, garmiyaan phoolon bharee

ped champaa kee lubhaateen, daaliyaan phoolon bharee

·

shushk bhoo par ye kataaron men khade darabaan se

driisht hote sir dhare jyon, topiyaan phoolon bharee

·

peet svarnim pushp khilate, sabz rangee paat sang

man chaman ko moh leteen, jhalakiyaan phoolon bharee

·

baal bachchon ko suhaataa, naam champak-wan bahut

jab kathaaen kah sunaateen, naaniyaan phoolon bharee

·

mugdh kawiyon ne yugon se, jaan mahimaa ped kee

kaavy granthon men rachaaeen, panktiyaan phoolon bharee

·

ped kaa har ang karataa, mupht rogon kaa nidaan

yaad aatee hain puraatan, sooktiyaan phoolon bharee

·

sookh jaate pushp lekin, phailakar inakee sugandh

ghoom aatee wishv men bhar, jholiyaan phoolon bharee

·

mitr ye paryaawaran ke, lahalahaate saal bhar

katu hawaaon ko sikhaate, boliyaan phoolon bharee

·

yah dharohar desh kee, rakkhen surakshit “kalpanaa”

yug yugon phalatee rahen, naw peeढ़iyaan phoolon bharee

जब वनों में गुनगुनातीं, गर्मियाँ फूलों भरी।

पेड़ चम्पा की लुभातीं, डालियाँ फूलों भरी।

शुष्क भू पर ये कतारों में खड़े दरबान से

दृष्ट होते सिर धरे ज्यों, टोपियाँ फूलों भरी।

पीत स्वर्णिम पुष्प खिलते, सब्ज़ रंगी पात सँग

मन चमन को मोह लेतीं, झलकियाँ फूलों भरी।

बाल बच्चों को सुहाता, नाम चम्पक-वन बहुत

जब कथाएँ कह सुनातीं, नानियाँ फूलों भरी।

मुग्ध कवियों ने युगों से, जान महिमा पेड़ की

काव्य ग्रन्थों में रचाईं, पंक्तियाँ फूलों भरी।

पेड़ का हर अंग करता, मुफ्त रोगों का निदान

याद आती हैं पुरातन, सूक्तियाँ फूलों भरी।

सूख जाते पुष्प लेकिन, फैलकर इनकी सुगंध

घूम आती विश्व में भर, झोलियाँ फूलों भरी।

मित्र ये पर्यावरण के, लहलहाते साल भर

कटु हवाओं को सिखाते, बोलियाँ फूलों भरी।

यह धरोहर देश की, रक्खें सुरक्षित “कल्पना”

युग युगों फलती रहें, नव पीढ़ियाँ फूलों भरी।

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗