कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना १०६ / २०५ № 106 of 205 रचना १०६ / २०५
१५ अक्तूबर २०१५ 15 October 2015 १५ अक्तूबर २०१५

मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित maatrii-shakti kee chaanv aparimit मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित

सकल

विश्व में फैली चारों ओर जीव हित।

॥

मंगलकारी

मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित।

॥

जब-जब

आती पाप-लोभ की बाढ़ जगत में

॥

नव-दुर्गा

तब प्राण हमारे करती रक्षित।

॥

मनता

जब नवरात्रि-पर्व हर साल देश में

॥

दिव्य

प्रभा से मिट जाता सारा तम दूषित।

॥

घटस्थापना, जगराते, माहौल बनाते

॥

जिसमें

होते सकल दुष्टतम भाव विसर्जित।

॥

चलता

दौर उपवास भजन का जब तक घर-घर

॥

माँ

देवी से माँगे जाते, वर मनवांछित।

॥

देशबंधुओं, नाम देश

का पर्वों से ही

॥

विश्व-फ़लक

पर स्वर्ण अक्षरों में है अंकित।

॥

अमर

रहें ये परम्पराएँ, युगों “कल्पना”

॥

अजर

रहे यह संस्कारों की ज्योत-अखंडित।

॥

- कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

sakal

wishv men phailee chaaron or jeew hit

·

mangalakaaree

maatrii-shakti kee chaanv aparimit

·

jab-jab

aatee paap-lobh kee baaढ़ jagat men

·

naw-durgaa

tab praan hamaare karatee rakshit

·

manataa

jab nawaraatri-parv har saal desh men

·

divy

prabhaa se mit jaataa saaraa tam dooshit

·

ghatasthaapanaa, jagaraate, maahaul banaate

·

jisamen

hote sakal dushtatam bhaaw wisarjit

·

chalataa

daur upawaas bhajan kaa jab tak ghar-ghar

·

maan

dewee se maange jaate, war manawaanchit

·

deshabandhuon, naam desh

kaa parvon se hee

·

wishv-falak

par svarn aksharon men hai ankit

·

amar

rahen ye paramparaaen, yugon “kalpanaa”

·

ajar

rahe yah sanskaaron kee jyot-akhandit

·

- kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

सकल

विश्व में फैली चारों ओर जीव हित।

॥

मंगलकारी

मातृ-शक्ति की छाँव अपरिमित।

॥

जब-जब

आती पाप-लोभ की बाढ़ जगत में

॥

नव-दुर्गा

तब प्राण हमारे करती रक्षित।

॥

मनता

जब नवरात्रि-पर्व हर साल देश में

॥

दिव्य

प्रभा से मिट जाता सारा तम दूषित।

॥

घटस्थापना, जगराते, माहौल बनाते

॥

जिसमें

होते सकल दुष्टतम भाव विसर्जित।

॥

चलता

दौर उपवास भजन का जब तक घर-घर

॥

माँ

देवी से माँगे जाते, वर मनवांछित।

॥

देशबंधुओं, नाम देश

का पर्वों से ही

॥

विश्व-फ़लक

पर स्वर्ण अक्षरों में है अंकित।

॥

अमर

रहें ये परम्पराएँ, युगों “कल्पना”

॥

अजर

रहे यह संस्कारों की ज्योत-अखंडित।

॥

- कल्पना रामानी

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗