कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ७९ / २०५ № 79 of 205 रचना ७९ / २०५
२३ मार्च २०१५ 23 March 2015 २३ मार्च २०१५

पसीने से जब-जब नहाती है गर्मी paseene se jab-jab nahaatee hai garmee पसीने से जब-जब नहाती है गर्मी

पसीने

से जब-जब नहाती है गर्मी

॥

हवाओं

से हमको मिलाती है गर्मी

॥

उगे-भोर, चिड़िया

बनी चहचहाती

॥

चमन

की तरफ लेके जाती है गर्मी

॥

पकड़

हाथ चलती है फुलवारियों में

॥

झकोरों

से झूला झुलाती है गर्मी

॥

छतों

पर सितारों की छाया में शब भर

॥

सरस

रागिनी गा सुलाती है गर्मी

॥

विजन

वन में पेड़ों की बन छाँव सुखकर

॥

महक

के गलीचे बिछाती है गर्मी

॥

अगम

झील में, ताल में, नाव खेकर

॥

धवल

धार-जल में घुमाती है गर्मी

॥

पहाड़ों

पे, फूलों-भरी वादियों में

॥

हमें

देके न्यौता बुलाती है गर्मी

॥

पिला

जूस, लस्सी या नींबू शिकंजी

॥

तपन

की चुभन से बचाती है गर्मी

॥

डरें

‘कल्पना’ क्यों भला गर्मियों से

॥

कि राहत भी लेकर ही आती

है गर्मी

॥

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

paseene

se jab-jab nahaatee hai garmee

·

hawaaon

se hamako milaatee hai garmee

·

uge-bhor, chidiyaa

banee chahachahaatee

·

chaman

kee taraph leke jaatee hai garmee

·

pakad

haath chalatee hai phulawaariyon men

·

jhakoron

se jhoolaa jhulaatee hai garmee

·

chaton

par sitaaron kee chaayaa men shab bhar

·

saras

raaginee gaa sulaatee hai garmee

·

wijan

wan men pedon kee ban chaanv sukhakar

·

mahak

ke galeeche bichaatee hai garmee

·

agam

jheel men, taal men, naaw khekar

·

dhawal

dhaar-jal men ghumaatee hai garmee

·

pahaadon

pe, phoolon-bharee waadiyon men

·

hamen

deke nyautaa bulaatee hai garmee

·

pilaa

joos, lassee yaa neenboo shikanjee

·

tapan

kee chubhan se bachaatee hai garmee

·

daren

‘kalpanaa’ kyon bhalaa garmiyon se

·

ki raahat bhee lekar hee aatee

hai garmee

·

-kalpanaa raamaanee protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

पसीने

से जब-जब नहाती है गर्मी

॥

हवाओं

से हमको मिलाती है गर्मी

॥

उगे-भोर, चिड़िया

बनी चहचहाती

॥

चमन

की तरफ लेके जाती है गर्मी

॥

पकड़

हाथ चलती है फुलवारियों में

॥

झकोरों

से झूला झुलाती है गर्मी

॥

छतों

पर सितारों की छाया में शब भर

॥

सरस

रागिनी गा सुलाती है गर्मी

॥

विजन

वन में पेड़ों की बन छाँव सुखकर

॥

महक

के गलीचे बिछाती है गर्मी

॥

अगम

झील में, ताल में, नाव खेकर

॥

धवल

धार-जल में घुमाती है गर्मी

॥

पहाड़ों

पे, फूलों-भरी वादियों में

॥

हमें

देके न्यौता बुलाती है गर्मी

॥

पिला

जूस, लस्सी या नींबू शिकंजी

॥

तपन

की चुभन से बचाती है गर्मी

॥

डरें

‘कल्पना’ क्यों भला गर्मियों से

॥

कि राहत भी लेकर ही आती

है गर्मी

॥

-कल्पना रामानी प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

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॥

-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗