कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ५८ / २०५ № 58 of 205 रचना ५८ / २०५
४ अक्तूबर २०१४ 4 October 2014 ४ अक्तूबर २०१४

फूल हमेशा बगिया में ही... phool hameshaa bagiyaa men hee फूल हमेशा बगिया में ही...

फूल

हमेशा बगिया में ही, प्यारे लगते।

॥

नीले

अंबर में ज्यों चाँद-सितारे लगते।

॥

बिन

फूलों के फुलवारी है एक बाँझ सी

॥

गोद

भरे तो माँ के राजदुलारे लगते।

॥

हर

आँगन में हरा-भरा यदि गुलशन होता

॥

महके-महके, गलियाँ औ’ चौबारे लगते।

॥

दिन

बिखराता रंग, रैन ले आती खुशबू

॥

ओस

कणों के संग सुखद भिनसारे लगते।

॥

फूल, तितलियाँ, भँवरे, झूले, नन्हें बालक

॥

मन-भावन

ये सारे, नूर-नज़ारे लगते।

॥

मिल

बैठें, बतियाएँ इनसे, जी चाहे जब

॥

स्वागत

में ये पल-पल बाँह पसारे लगते।

॥

घर

से बेघर कभी ‘कल्पना’ करें न इनको

॥

तनहाई

में ये ही खास हमारे लगते।

॥

- कल्पना रामानी

॥

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

॥

-कल्पना रामानी

phool

hameshaa bagiyaa men hee, pyaare lagate

·

neele

anbar men jyon chaand-sitaare lagate

·

bin

phoolon ke phulawaaree hai ek baanjh see

·

god

bhare to maan ke raajadulaare lagate

·

har

aangan men haraa-bharaa yadi gulashan hotaa

·

mahake-mahake, galiyaan au’ chaubaare lagate

·

din

bikharaataa rang, rain le aatee khushaboo

·

os

kanon ke sang sukhad bhinasaare lagate

·

phool, titaliyaan, bhanvare, jhoole, nanhen baalak

·

man-bhaawan

ye saare, noor-nazaare lagate

·

mil

baithen, batiyaaen inase, jee chaahe jab

·

svaagat

men ye pal-pal baanh pasaare lagate

·

ghar

se beghar kabhee ‘kalpanaa’ karen n inako

·

tanahaaee

men ye hee khaas hamaare lagate

·

- kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

फूल

हमेशा बगिया में ही, प्यारे लगते।

॥

नीले

अंबर में ज्यों चाँद-सितारे लगते।

॥

बिन

फूलों के फुलवारी है एक बाँझ सी

॥

गोद

भरे तो माँ के राजदुलारे लगते।

॥

हर

आँगन में हरा-भरा यदि गुलशन होता

॥

महके-महके, गलियाँ औ’ चौबारे लगते।

॥

दिन

बिखराता रंग, रैन ले आती खुशबू

॥

ओस

कणों के संग सुखद भिनसारे लगते।

॥

फूल, तितलियाँ, भँवरे, झूले, नन्हें बालक

॥

मन-भावन

ये सारे, नूर-नज़ारे लगते।

॥

मिल

बैठें, बतियाएँ इनसे, जी चाहे जब

॥

स्वागत

में ये पल-पल बाँह पसारे लगते।

॥

घर

से बेघर कभी ‘कल्पना’ करें न इनको

॥

तनहाई

में ये ही खास हमारे लगते।

॥

- कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗