कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी ग़ज़ल Ghazal ग़ज़ल · रचना ९७ / २०४ № 97 of 204 रचना ९७ / २०४
१८ जुलाई २०१५ 18 July 2015 १८ जुलाई २०१५

सेवा हमपर मुग्ध हुई हम सेवा मुक्त हुए sewaa hamapar mugdh huee ham sewaa mukt hue सेवा हमपर मुग्ध हुई हम सेवा मुक्त हुए

सेवा

हमपर मुग्ध हुई, हम सेवामुक्त हुए

सुर्खी

में थे कल तक, अब तो प्राणी लुप्त हुए

हाथ

खिलाते थे जिनको, वे हाथ खिलाते हैं

कैसा

यह अभियोग लगा, जो घर-अभियुक्त हुए

पालित

थे, वे पालक हैं अब, कैसी हवा चली

बँधे

हुए खूँटे से खा-पी,

मौजी-मस्त हुए

वैद्य

बने बैठे हैं घर के, छोटे-बड़े सभी

सौ

हिदायतें, स्वास्थ्य शुद्धि के, नुस्खे मुफ्त हुए

क्या

मज़ाल पग उठ चलने की, कर बैठें गलती

चाल-चहलकदमी

पर भी अब, पहरे सख्त हुए

यों

तो रोज़ बुलाती थी वो, बैठक की कुर्सी

धकियाते

थे जिसे, उसीसे, चिपके लस्त हुए

खान-पान, जल-स्नान ‘कल्पना’ सब घर की मर्ज़ी

हम

न रहे हम, या रब ऐसे, क्यों अभिशप्त हुए

-कल्पना रामानी

प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार

पुनः पधारिए

-कल्पना रामानी

sewaa

hamapar mugdh huee, ham sewaamukt hue

·

surkhee

men the kal tak, ab to praanee lupt hue

·

haath

khilaate the jinako, we haath khilaate hain

·

kaisaa

yah abhiyog lagaa, jo ghar-abhiyukt hue

·

paalit

the, we paalak hain ab, kaisee hawaa chalee

·

bandhe

hue khoonte se khaa-pee,

maujee-mast hue

·

waidy

bane baithe hain ghar ke, chote-bade sabhee

·

sau

hidaayaten, svaasthy shuddhi ke, nuskhe mupht hue

·

kyaa

mazaal pag uth chalane kee, kar baithen galatee

·

chaal-chahalakadamee

par bhee ab, pahare sakht hue

·

yon

to roz bulaatee thee wo, baithak kee kursee

·

dhakiyaate

the jise, useese, chipake last hue

·

khaan-paan, jal-snaan ‘kalpanaa’ sab ghar kee marzee

·

ham

n rahe ham, yaa rab aise, kyon abhishapt hue

·

-kalpanaa raamaanee

·

protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar

punah padhaarie

·

-kalpanaa raamaanee

सेवा

हमपर मुग्ध हुई, हम सेवामुक्त हुए

सुर्खी

में थे कल तक, अब तो प्राणी लुप्त हुए

हाथ

खिलाते थे जिनको, वे हाथ खिलाते हैं

कैसा

यह अभियोग लगा, जो घर-अभियुक्त हुए

पालित

थे, वे पालक हैं अब, कैसी हवा चली

बँधे

हुए खूँटे से खा-पी,

मौजी-मस्त हुए

वैद्य

बने बैठे हैं घर के, छोटे-बड़े सभी

सौ

हिदायतें, स्वास्थ्य शुद्धि के, नुस्खे मुफ्त हुए

क्या

मज़ाल पग उठ चलने की, कर बैठें गलती

चाल-चहलकदमी

पर भी अब, पहरे सख्त हुए

यों

तो रोज़ बुलाती थी वो, बैठक की कुर्सी

धकियाते

थे जिसे, उसीसे, चिपके लस्त हुए

खान-पान, जल-स्नान ‘कल्पना’ सब घर की मर्ज़ी

हम

न रहे हम, या रब ऐसे, क्यों अभिशप्त हुए

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗