सेवा हमपर मुग्ध हुई हम सेवा मुक्त हुए sewaa hamapar mugdh huee ham sewaa mukt hue सेवा हमपर मुग्ध हुई हम सेवा मुक्त हुए
सेवा
हमपर मुग्ध हुई, हम सेवामुक्त हुए
सुर्खी
में थे कल तक, अब तो प्राणी लुप्त हुए
हाथ
खिलाते थे जिनको, वे हाथ खिलाते हैं
कैसा
यह अभियोग लगा, जो घर-अभियुक्त हुए
पालित
थे, वे पालक हैं अब, कैसी हवा चली
बँधे
हुए खूँटे से खा-पी,
मौजी-मस्त हुए
वैद्य
बने बैठे हैं घर के, छोटे-बड़े सभी
सौ
हिदायतें, स्वास्थ्य शुद्धि के, नुस्खे मुफ्त हुए
क्या
मज़ाल पग उठ चलने की, कर बैठें गलती
चाल-चहलकदमी
पर भी अब, पहरे सख्त हुए
यों
तो रोज़ बुलाती थी वो, बैठक की कुर्सी
धकियाते
थे जिसे, उसीसे, चिपके लस्त हुए
खान-पान, जल-स्नान ‘कल्पना’ सब घर की मर्ज़ी
हम
न रहे हम, या रब ऐसे, क्यों अभिशप्त हुए
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी
sewaa
hamapar mugdh huee, ham sewaamukt hue
surkhee
men the kal tak, ab to praanee lupt hue
haath
khilaate the jinako, we haath khilaate hain
kaisaa
yah abhiyog lagaa, jo ghar-abhiyukt hue
paalit
the, we paalak hain ab, kaisee hawaa chalee
bandhe
hue khoonte se khaa-pee,
maujee-mast hue
waidy
bane baithe hain ghar ke, chote-bade sabhee
sau
hidaayaten, svaasthy shuddhi ke, nuskhe mupht hue
kyaa
mazaal pag uth chalane kee, kar baithen galatee
chaal-chahalakadamee
par bhee ab, pahare sakht hue
yon
to roz bulaatee thee wo, baithak kee kursee
dhakiyaate
the jise, useese, chipake last hue
khaan-paan, jal-snaan ‘kalpanaa’ sab ghar kee marzee
ham
n rahe ham, yaa rab aise, kyon abhishapt hue
-kalpanaa raamaanee
protsaahit karatee huee sundar tippanee ke lie aapakaa haardik aabhaar
punah padhaarie
-kalpanaa raamaanee
सेवा
हमपर मुग्ध हुई, हम सेवामुक्त हुए
सुर्खी
में थे कल तक, अब तो प्राणी लुप्त हुए
हाथ
खिलाते थे जिनको, वे हाथ खिलाते हैं
कैसा
यह अभियोग लगा, जो घर-अभियुक्त हुए
पालित
थे, वे पालक हैं अब, कैसी हवा चली
बँधे
हुए खूँटे से खा-पी,
मौजी-मस्त हुए
वैद्य
बने बैठे हैं घर के, छोटे-बड़े सभी
सौ
हिदायतें, स्वास्थ्य शुद्धि के, नुस्खे मुफ्त हुए
क्या
मज़ाल पग उठ चलने की, कर बैठें गलती
चाल-चहलकदमी
पर भी अब, पहरे सख्त हुए
यों
तो रोज़ बुलाती थी वो, बैठक की कुर्सी
धकियाते
थे जिसे, उसीसे, चिपके लस्त हुए
खान-पान, जल-स्नान ‘कल्पना’ सब घर की मर्ज़ी
हम
न रहे हम, या रब ऐसे, क्यों अभिशप्त हुए
-कल्पना रामानी
प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार
पुनः पधारिए
-कल्पना रामानी