कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना ८७ / १६३ № 87 of 163 रचना ८७ / १६३
१४ दिसम्बर २०१४ 14 December 2014 १४ दिसम्बर २०१४

धूप सखी है विनती मेरी dhoop sakhee hai winatee meree धूप सखी है विनती मेरी

धूप, सखी! है विनती मेरी

कुछ दिन जाकर शहर बिताना

पुत्र गया धन वहाँ कमाने,

जाकर उसका तन सहलाना।

वहाँ शीत पड़ती है भारी।

कोहरा करता चौकीदारी।

तुम सूरज की परम प्रिया

हो

रख लेगा वो बात

तुम्हारी।

दबे पाँव चुपचाप पहुँचकर

उसे प्रेम से गले लगाना।

रात, नींद जब आती होगी

साँकल शीत बजाती होगी

चुपके से दर-दीवारों पर

बर्फ हर्फ लिख जाती होगी।

सुबह-सुबह तुम ज़रा झाँककर

पुनः

dhoop, sakhee! hai winatee meree

·

kuch din jaakar shahar bitaanaa

·

putr gayaa dhan wahaan kamaane,

·

jaakar usakaa tan sahalaanaa

·

wahaan sheet padatee hai bhaaree

·

koharaa karataa chaukeedaaree

·

tum sooraj kee param priyaa

ho

·

rakh legaa wo baat

tumhaaree

·

dabe paanv chupachaap pahunchakar

·

use prem se gale lagaanaa

·

raat, neend jab aatee hogee

·

saankal sheet bajaatee hogee

·

chupake se dar-deewaaron par

·

barph harph likh jaatee hogee

·

subah-subah tum zaraa jhaankakar

·

punah

धूप, सखी! है विनती मेरी

कुछ दिन जाकर शहर बिताना

पुत्र गया धन वहाँ कमाने,

जाकर उसका तन सहलाना।

वहाँ शीत पड़ती है भारी।

कोहरा करता चौकीदारी।

तुम सूरज की परम प्रिया

हो

रख लेगा वो बात

तुम्हारी।

दबे पाँव चुपचाप पहुँचकर

उसे प्रेम से गले लगाना।

रात, नींद जब आती होगी

साँकल शीत बजाती होगी

चुपके से दर-दीवारों पर

बर्फ हर्फ लिख जाती होगी।

सुबह-सुबह तुम ज़रा झाँककर

पुनः

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗