धूप सखी है विनती मेरी dhoop sakhee hai winatee meree धूप सखी है विनती मेरी
धूप, सखी! है विनती मेरी
कुछ दिन जाकर शहर बिताना
पुत्र गया धन वहाँ कमाने,
जाकर उसका तन सहलाना।
वहाँ शीत पड़ती है भारी।
कोहरा करता चौकीदारी।
तुम सूरज की परम प्रिया
हो
रख लेगा वो बात
तुम्हारी।
दबे पाँव चुपचाप पहुँचकर
उसे प्रेम से गले लगाना।
रात, नींद जब आती होगी
साँकल शीत बजाती होगी
चुपके से दर-दीवारों पर
बर्फ हर्फ लिख जाती होगी।
सुबह-सुबह तुम ज़रा झाँककर
पुनः
dhoop, sakhee! hai winatee meree
kuch din jaakar shahar bitaanaa
putr gayaa dhan wahaan kamaane,
jaakar usakaa tan sahalaanaa
wahaan sheet padatee hai bhaaree
koharaa karataa chaukeedaaree
tum sooraj kee param priyaa
ho
rakh legaa wo baat
tumhaaree
dabe paanv chupachaap pahunchakar
use prem se gale lagaanaa
raat, neend jab aatee hogee
saankal sheet bajaatee hogee
chupake se dar-deewaaron par
barph harph likh jaatee hogee
subah-subah tum zaraa jhaankakar
punah
धूप, सखी! है विनती मेरी
कुछ दिन जाकर शहर बिताना
पुत्र गया धन वहाँ कमाने,
जाकर उसका तन सहलाना।
वहाँ शीत पड़ती है भारी।
कोहरा करता चौकीदारी।
तुम सूरज की परम प्रिया
हो
रख लेगा वो बात
तुम्हारी।
दबे पाँव चुपचाप पहुँचकर
उसे प्रेम से गले लगाना।
रात, नींद जब आती होगी
साँकल शीत बजाती होगी
चुपके से दर-दीवारों पर
बर्फ हर्फ लिख जाती होगी।
सुबह-सुबह तुम ज़रा झाँककर
पुनः