गाँवों के पंछी उदास हैं gaanvon ke panchee udaas hain गाँवों के पंछी उदास हैं
गाँवों के पंछी उदास हैं
देख-देख सन्नाटा भारी।
जब से नई हवा ने अपना
रुख मोड़ा शहरों की ओर।
बंद किवाड़ों से टकराकर
वापस जाती है हर भोर।
नहीं बुलाते चुग्गा लेकर
अब उनको मुंडेर, अटारी।
हर आँगन के हरे पेड़ पर
पतझड़ बैठा डेरा डाल।
भीत हो रहा तुलसी चौरा
देख सन्निकट अपना काल।
बदल रहा है अब तो हर घर
वृद्धाश्रम में बारी-बारी।
gaanvon ke panchee udaas hain
dekh-dekh sannaataa bhaaree
jab se naee hawaa ne apanaa
rukh modaa shaharon kee or
band kiwaadon se takaraakar
waapas jaatee hai har bhor
naheen bulaate chuggaa lekar
ab unako munder, ataaree
har aangan ke hare ped par
patajhad baithaa deraa daal
bheet ho rahaa tulasee chauraa
dekh sannikat apanaa kaal
badal rahaa hai ab to har ghar
wriiddhaashram men baaree-baaree
गाँवों के पंछी उदास हैं
देख-देख सन्नाटा भारी।
जब से नई हवा ने अपना
रुख मोड़ा शहरों की ओर।
बंद किवाड़ों से टकराकर
वापस जाती है हर भोर।
नहीं बुलाते चुग्गा लेकर
अब उनको मुंडेर, अटारी।
हर आँगन के हरे पेड़ पर
पतझड़ बैठा डेरा डाल।
भीत हो रहा तुलसी चौरा
देख सन्निकट अपना काल।
बदल रहा है अब तो हर घर
वृद्धाश्रम में बारी-बारी।