घाट से मंदिर तलक ghaat se mandir talak घाट से मंदिर तलक
बदनसीबों को बसाकर गोद
में,
ढँकती रहीं ये सीढ़ियाँ।
घाट से मंदिर तलक बढ़ते कदम,
तकती रहीं ये सीढ़ियाँ।
धूप, दीपक आरती
से, जाग जाती रोज़ प्रात।
दिन भजन करते मगन
औ’ बाँटतीं शामें प्रसाद।
शेष को भूखे नयन तरसा
किए,
लखती रहीं ये सीढ़ियाँ।
मूर्तियों के सामने,
लगते रहे नित रत्न ढेर।
तिलक
badanaseebon ko basaakar god
men,
dhankatee raheen ye seeढ़iyaan
ghaat se mandir talak bढ़te kadam,
takatee raheen ye seeढ़iyaan
dhoop, deepak aaratee
se, jaag jaatee roz praat
din bhajan karate magan
au’ baantateen shaamen prasaad
shesh ko bhookhe nayan tarasaa
kie,
lakhatee raheen ye seeढ़iyaan
moortiyon ke saamane,
lagate rahe nit ratn dher
tilak
बदनसीबों को बसाकर गोद
में,
ढँकती रहीं ये सीढ़ियाँ।
घाट से मंदिर तलक बढ़ते कदम,
तकती रहीं ये सीढ़ियाँ।
धूप, दीपक आरती
से, जाग जाती रोज़ प्रात।
दिन भजन करते मगन
औ’ बाँटतीं शामें प्रसाद।
शेष को भूखे नयन तरसा
किए,
लखती रहीं ये सीढ़ियाँ।
मूर्तियों के सामने,
लगते रहे नित रत्न ढेर।
तिलक