कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
सभी रचनाएँ All writings सभ रचनाऊं
कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १२१ / १६४ № 121 of 164 रचना १२१ / १६४
२३ मार्च २०१६ 23 March 2016 २३ मार्च २०१६

क्यों न मन फागुन बने kyon n mun phaagun bane क्यों न मन फागुन बने

रंग सारे भूमि पर आकर मिले हैं

क्यों न मन फागुन बने

प्रकृति ने फिर प्रेम के पुखराज

जी भर कर लुटाए

सुरभि से रसराज ने कालीन

बगिया में बिछाए

हर तरफ आनंद-रस के सिलसिले है

क्यों न मन फागुन बने

रमणियों-पग रच हिना ने

पायलों से प्रीत जोड़ी

और पिचकारी चली भरकर

ठिठोली-भंग थोड़ी

गेर ने गटके सभी शिकवे गिले हैं

क्यों न मन फागुन बने

रंग सारे दाग धो देते

दिलों के दलदलों से

और अंतर्घट गले तक

पूर होते शतदलों से

बैर के, जड़ छोड़ ढह जाते किले हैं

क्यों न मन फागुन बने

rang saare bhoomi par aakar mile hain

kyon n mun phaagun bane

·

prakriiti ne phir prem ke pukharaaj

jee bhar kar lutaae

surabhi se rasaraaj ne kaaleen

bagiyaa men bichhaae

har taraph aanand-ras ke silasile hai

kyon n mun phaagun bane

·

ramaniyon-pag rach hinaa ne

paayalon se preet jodee

aur pichakaaree chalee bharakar

thitholee-bhang thodee

ger ne gatake sabhee shikawe gile hain

kyon n mun phaagun bane

·

rang saare daag dho dete

dilon ke dalaadalon se

aur antarghat gale tak

poor hote shatadalon se

bair ke, jad chod dhah jaate kile hain

kyon n mun phaagun bane

रंग सारे भूमि पर आकर मिले हैं

क्यों न मन फागुन बने

प्रकृति ने फिर प्रेम के पुखराज

जी भर कर लुटाए

सुरभि से रसराज ने कालीन

बगिया में बिछाए

हर तरफ आनंद-रस के सिलसिले है

क्यों न मन फागुन बने

रमणियों-पग रच हिना ने

पायलों से प्रीत जोड़ी

और पिचकारी चली भरकर

ठिठोली-भंग थोड़ी

गेर ने गटके सभी शिकवे गिले हैं

क्यों न मन फागुन बने

रंग सारे दाग धो देते

दिलों के दलदलों से

और अंतर्घट गले तक

पूर होते शतदलों से

बैर के, जड़ छोड़ ढह जाते किले हैं

क्यों न मन फागुन बने

कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗