क्यों न मन फागुन बने kyon n mun phaagun bane क्यों न मन फागुन बने
रंग सारे भूमि पर आकर मिले हैं
क्यों न मन फागुन बने
प्रकृति ने फिर प्रेम के पुखराज
जी भर कर लुटाए
सुरभि से रसराज ने कालीन
बगिया में बिछाए
हर तरफ आनंद-रस के सिलसिले है
क्यों न मन फागुन बने
रमणियों-पग रच हिना ने
पायलों से प्रीत जोड़ी
और पिचकारी चली भरकर
ठिठोली-भंग थोड़ी
गेर ने गटके सभी शिकवे गिले हैं
क्यों न मन फागुन बने
रंग सारे दाग धो देते
दिलों के दलदलों से
और अंतर्घट गले तक
पूर होते शतदलों से
बैर के, जड़ छोड़ ढह जाते किले हैं
क्यों न मन फागुन बने
rang saare bhoomi par aakar mile hain
kyon n mun phaagun bane
prakriiti ne phir prem ke pukharaaj
jee bhar kar lutaae
surabhi se rasaraaj ne kaaleen
bagiyaa men bichhaae
har taraph aanand-ras ke silasile hai
kyon n mun phaagun bane
ramaniyon-pag rach hinaa ne
paayalon se preet jodee
aur pichakaaree chalee bharakar
thitholee-bhang thodee
ger ne gatake sabhee shikawe gile hain
kyon n mun phaagun bane
rang saare daag dho dete
dilon ke dalaadalon se
aur antarghat gale tak
poor hote shatadalon se
bair ke, jad chod dhah jaate kile hain
kyon n mun phaagun bane
रंग सारे भूमि पर आकर मिले हैं
क्यों न मन फागुन बने
प्रकृति ने फिर प्रेम के पुखराज
जी भर कर लुटाए
सुरभि से रसराज ने कालीन
बगिया में बिछाए
हर तरफ आनंद-रस के सिलसिले है
क्यों न मन फागुन बने
रमणियों-पग रच हिना ने
पायलों से प्रीत जोड़ी
और पिचकारी चली भरकर
ठिठोली-भंग थोड़ी
गेर ने गटके सभी शिकवे गिले हैं
क्यों न मन फागुन बने
रंग सारे दाग धो देते
दिलों के दलदलों से
और अंतर्घट गले तक
पूर होते शतदलों से
बैर के, जड़ छोड़ ढह जाते किले हैं
क्यों न मन फागुन बने