कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३ poet  ·  1951 – 2023 कवयित्री  ·  १९५१ – २०२३
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कल्पना रामानी Kalpana Ramani कल्पना रामानी नवगीत Navgeet नवगीतु · रचना १ / १६३ № 1 of 163 रचना १ / १६३
२६ अक्तूबर २०१२ 26 October 2012 २६ अक्तूबर २०१२

विस्मित कुदरत पूछ रही है wismit kudarat pooch rahee hai विस्मित कुदरत पूछ रही है

शुद्ध हवा को लील रही हैं

ऊँची-ऊँची इमारतें।

घर तो बदल गए पिंजड़ों में

पंख कटे पंछी इंसान।

हवा विषैली नभ तक फैली

पंख पखेरू भी हैरान।

मानव ने ही स्वयं जुटाए

अपनी आफत के सामान।

अब तो पोर पोर पर दिखतीं

थकी थकी सी इबारतें।

कल पुर्जों में बदली काया

है विज्ञान बना मोहरा।

विध्वंसों का निर्माणों पर

हावी हुआ घना कोहरा।

कान फाड़ता शोर असीमित

shuddh hawaa ko leel rahee hain

oonchee-oonchee imaaraten

·

ghar to badal gae pinjadon men

·

pankh kate panchee insaan

·

hawaa wishailee nabh tak phailee

·

pankh pakheroo bhee hairaan

·

maanaw ne hee svayan jutaae

·

apanee aaphat ke saamaan

·

ab to por por par dikhateen

·

thakee thakee see ibaaraten

·

kal purjon men badalee kaayaa

·

hai wijnaan banaa moharaa

·

widhvanson kaa nirmaanon par

·

haawee huaa ghanaa koharaa

·

kaan phaadataa shor aseemit

शुद्ध हवा को लील रही हैं

ऊँची-ऊँची इमारतें।

घर तो बदल गए पिंजड़ों में

पंख कटे पंछी इंसान।

हवा विषैली नभ तक फैली

पंख पखेरू भी हैरान।

मानव ने ही स्वयं जुटाए

अपनी आफत के सामान।

अब तो पोर पोर पर दिखतीं

थकी थकी सी इबारतें।

कल पुर्जों में बदली काया

है विज्ञान बना मोहरा।

विध्वंसों का निर्माणों पर

हावी हुआ घना कोहरा।

कान फाड़ता शोर असीमित

कल्पना Kalpana कल्पना

मूल स्रोत ↗ Original source ↗ असल सोरस ↗